श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d77
 
 
श्लोक  12.220.d77 
श्वेतकेतुरुवाच
अहंशब्दो ह्यहंभावो नात्मभावे शुभव्रते।
न वर्तन्ते परेऽचिन्त्ये वाच: सगुणलक्षणा:॥
 
 
अनुवाद
श्वेतकेतु बोले- हे धन्य! अहंकार शब्द का प्रयोग आत्मा के अर्थ में नहीं होता; अपितु आत्म-भाव में केवल अहंकार का ही प्रयोग होता है; क्योंकि सगुण पदार्थ का बोध कराने वाले शब्द अचिन्त्य परब्रह्म परमात्मा का बोध कराने में असमर्थ हैं।
 
Shvetketu said-O blessed one! The word ego is not used in the sense of self; But only ego feeling is used in self-feeling; Because the words connoting the sagun substance are unable to give the understanding of the unthinkable Parabrahma Paramatma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)