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mahabharat 12.220.d75: श्वेतकेतु बोले, "मैंने यश के विरुद्ध कोई बात नहीं कही है। देखो, पृथ्वी या पार्थिव जगत आकाश के बिना नहीं रह सकता, तथापि, उनमें कोई शाश्वत संबंध नहीं है। शब्द और अर्थ का संबंध भी ऐसा ही मानना ​​चाहिए।"   |   mahabharat अध्याय 12.220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d75
 
 
श्लोक  12.220.d75 
श्वेतकेतुरुवाच
न विकूलोऽत्र कथितो नाकाशं हि विना जगत‍्।
सम्बन्धस्तत्र नास्त्येव तद्वदित्येष मन्यताम्॥
 
 
अनुवाद
श्वेतकेतु बोले, "मैंने यश के विरुद्ध कोई बात नहीं कही है। देखो, पृथ्वी या पार्थिव जगत आकाश के बिना नहीं रह सकता, तथापि, उनमें कोई शाश्वत संबंध नहीं है। शब्द और अर्थ का संबंध भी ऐसा ही मानना ​​चाहिए।"
 
Swetaketu said, "I have not said anything contrary to fame. Look, the earth or the terrestrial world cannot exist without the sky, however, there is no eternal relation between them. The relation between word and meaning should also be considered the same."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)