श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d63
 
 
श्लोक  12.220.d63 
यावत् पांसव उद्दिष्टास्तावत्योऽस्य विभूतय:।
तावत्यश्चैव मायास्तु तावत्योऽस्याश्च शक्तय:॥
 
 
अनुवाद
भगवान की जितनी शक्तियाँ हैं, धूल के कण भी उतने ही हैं, उनकी माया भी उतनी ही है, तथा उन मायाओं की भी उतनी ही शक्तियाँ हैं।
 
There are as many particles of dust as the Supreme Lord's powers, there are as many illusions of His, and there are as many powers of those illusions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)