श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d61
 
 
श्लोक  12.220.d61 
संकीर्णे च तथा धर्मे वर्णसंकरमेति च।
संकरे च प्रवृत्ते तु मात्स्यो न्याय: प्रवर्तते॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जब धर्म में संकीर्णता आती है तो लोगों में वर्णसंकरता फैलती है और जब वर्णसंकरता फैलती है तो सर्वत्र मत्स्य न्याय का प्रचलन होने लगता है (जैसे बलवान मछली दुर्बल मछली को निगल जाती है, वैसे ही बलवान व्यक्ति दुर्बल को सताने लगते हैं)।
 
In this way, when narrowness comes in religion, hybridisation of castes spreads among the people and when hybridisation spreads, the practice of Matsya Nyaya (the law of the fishes) starts everywhere (just as a strong fish swallows a weak fish, similarly the strong men start harassing the weak ones).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)