श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d5-d6
 
 
श्लोक  12.220.d5-d6 
प्रदानसमयं प्राप्ता पिता तस्य ह्यचिन्तयत्॥
अस्या: पति: कुतो वेति ब्राह्मण: श्रोत्रिय: पर:।
विद्वान् विप्रो ह्यकुटुम्ब: प्रियवादी महातपा:॥
 
 
अनुवाद
धीरे-धीरे वह विवाह के योग्य हो गई। उसके पिता सोचने लगे, इस पुत्री का पति तो कोई महान श्रोत्रिय ब्राह्मण होना चाहिए, जो विद्वान हो, मधुर वाणी बोलने वाला हो, महान तपस्वी हो और अविवाहित हो; परंतु ऐसा पुरुष सहज में कहाँ मिलेगा?
 
Gradually she became eligible for marriage. Her father started thinking, the husband of this daughter should be a great Shrotri Brahmin, who is learned, speaks sweet words, is a great ascetic and is unmarried; but where can such a man be easily available?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)