श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d47-d49
 
 
श्लोक  12.220.d47-d49 
न ममेति च भावेन ज्ञानाग्निनिलयेन च।
अनन्तरं तथा कुर्यास्तानि कर्माणि भस्मसात्॥
एवं त्वया च कर्तव्यं सर्वदादुर्भगा मया।
यद् यदाचरति श्रेष्ठ: तत् तदेवेतरो जन:॥
तस्माल्लोकस्य सिद्धॺर्थं कर्तव्यं चात्मसिद्धये॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात, उन समस्त कर्मों को ज्ञानाग्नि द्वारा इस भावना के साथ जला डालो कि 'ये सब कर्म मेरे नहीं हैं और मैं इनका कर्ता नहीं हूँ', तुम परम सौभाग्यशाली हो। तुम्हें सदैव आसक्ति और अहंकार से रहित होकर इसी प्रकार कर्म करना चाहिए और मुझे भी ऐसा ही करना चाहिए। महापुरुष जो आचरण करते हैं, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं, अतः लोक-व्यवहार की सिद्धि और आत्म-कल्याण के लिए हम दोनों को कर्मों का अनुष्ठान करते रहना चाहिए।
 
Thereafter, burn all those deeds with the fire of knowledge with the feeling that 'all these deeds are not mine and I am not the doer of them', you are extremely fortunate. You should always act like this without attachment and ego and I should also do the same. Whatever conduct a great man does, other people also do the same, hence for the accomplishment of public behavior and self-welfare, both of us should keep performing rituals of actions.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)