श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d42-d44
 
 
श्लोक  12.220.d42-d44 
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै देवलो मुनिपुङ्गव:।
प्रतिगृह्य च तां कन्यां श्वेतकेतुर्महायशा:॥
उपयम्य यथान्यायमत्र कृत्वा यथाविधि।
समाप्य तन्त्रं मुनिभिर्वैवाहिकमनुत्तमम्॥
स गार्हस्थ्ये वसन् धीमान् भार्यां तामिदमब्रवीत् ॥
 
 
अनुवाद
भीष्मजी कहते हैं - राजन! ऐसा कहकर देवल ऋषि ने अपनी कन्या उनसे ब्याह दी। महायशस्वी श्वेतकेतु ने उस कन्या को ले जाकर विधिपूर्वक विवाह किया। तत्पश्चात् ऋषियों द्वारा सम्पन्न उत्तम विवाह-विधि सम्पन्न करके बुद्धिमान श्वेतकेतु ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए अपनी पत्नी से यह बात कही।
 
Bhishmaji says - King! Saying this, the sage Devala gave him his daughter in marriage. The highly renowned Swetaketu took the girl and married her in a proper manner. Then after completing the best marriage ceremony conducted by the sages, the intelligent Swetaketu, while living in the household, said this to his wife.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)