श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d35
 
 
श्लोक  12.220.d35 
स्थितोऽहं निर्भर: शान्त: कार्यकारणभावन:।
अविद्यया तरन् मृत्युं विद्यया तं तथामृतम्॥
यथाप्राप्तं तु संदृश्य वसामीह विमत्सर:।
 
 
अनुवाद
मैं ईश्वर को कारण और कार्यरूप मानकर सदैव शांतिपूर्वक उन्हीं पर आश्रित रहता हूँ। कर्मों के अनुष्ठान द्वारा मृत्यु को पार करके मैंने ज्ञान द्वारा ईश्वररूपी अमृत का अनुभव किया है और जो कुछ भी मुझे प्रारब्धानुसार प्राप्त होता है, उसे समभाव से देखकर ईर्ष्या और द्वेष से रहित होकर यहाँ निवास करता हूँ।
 
'Thinking about God as the cause and effect, I always remain peacefully dependent on Him. Having crossed death through the ritual of deeds, I have experienced the nectar of God through knowledge and looking at whatever I receive as per my destiny with equanimity, I reside here, free from jealousy and hatred.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)