श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d30-d31
 
 
श्लोक  12.220.d30-d31 
येनेदं वीक्षते नित्यं वृणोति स्पृशतेऽथ वा॥
घ्रायते वक्ति सततं येनेदं रसते पुन:।
येनेदं मन्यते तत्त्वं येन बुध्यति वा पुन:॥
न चक्षुर्विद्यते ह्येतत् स वै भूतान्ध उच्यते।
 
 
अनुवाद
जिस दिव्य शक्ति के द्वारा जीवात्मा निरन्तर देखता, अनुभव करता, स्पर्श करता, सूँघता, बोलता, निरन्तर नाना प्रकार के पदार्थों का स्वाद लेता, तत्त्वों का चिन्तन करता और बुद्धि के द्वारा निर्णय करता है, उसे नेत्र* कहते हैं। जो इस नेत्र से रहित है, वह जीवों में अन्धा कहा गया है (और ईश्वरस्वरूप नेत्र होने के कारण मैं भी अन्धा हूँ)।
 
'The divine power by which the living soul always sees, perceives, touches, smells, speaks, constantly tastes various things, contemplates the elements and makes decisions through the intellect, is called the eye*. The one who is without this eye is called blind among the living beings (and because of having the eye in the form of God, I am also blind-eyed).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)