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mahabharat 12.220.d29: मैं अंधी हूँ, यह सत्य है। मैं मन ही मन यह विश्वास रखती हूँ। और चूँकि मैं संशय-मुक्त हूँ, इसलिए मुझे विशाल नेत्रों का वरदान प्राप्त है। आप मुझे इसी प्रकार समझें। हे उत्तम अंगों वाली अतुलनीय सुन्दरी! मुझे स्वीकार करें। मैं आपकी मनोकामनाएँ पूर्ण करूँगी।   |   mahabharat अध्याय 12.220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d29
 
 
श्लोक  12.220.d29 
अन्धोऽहमत्र तत्त्वं हि तथा मन्ये च सर्वदा।
विशालनयनं विद्धि तथा मां हीनसंशयम्॥
वृणीष्व मां वरारोहे भजे च त्वामनिन्दिते।
 
 
अनुवाद
मैं अंधी हूँ, यह सत्य है। मैं मन ही मन यह विश्वास रखती हूँ। और चूँकि मैं संशय-मुक्त हूँ, इसलिए मुझे विशाल नेत्रों का वरदान प्राप्त है। आप मुझे इसी प्रकार समझें। हे उत्तम अंगों वाली अतुलनीय सुन्दरी! मुझे स्वीकार करें। मैं आपकी मनोकामनाएँ पूर्ण करूँगी।
 
'I am blind, this is true. I always believe this in my mind. Also, because I am free from doubts, I am blessed with huge eyes. You should understand me like this. O incomparably beautiful lady with excellent limbs! Accept me. I will fulfill your desires.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)