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mahabharat 12.220.d101: यही ईश्वर का ज्ञान है। यही अहंकार की सीमा है। हम दोनों का अस्तित्व शाश्वत नहीं है, ऐसी धारणा अज्ञान के कारण उत्पन्न होती है।   |   mahabharat अध्याय 12.220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक d101
 
 
श्लोक  12.220.d101 
एतावदात्मविज्ञानमेतावद् यदहं स्मृतम्॥
आवयोर्न च सत्त्वे वै तस्मादज्ञानबन्धनम्।
 
 
अनुवाद
यही ईश्वर का ज्ञान है। यही अहंकार की सीमा है। हम दोनों का अस्तित्व शाश्वत नहीं है, ऐसी धारणा अज्ञान के कारण उत्पन्न होती है।
 
This is the knowledge of God. This is the extent of the ego. The existence of both of us is not eternal, such a notion arises due to ignorance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)