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mahabharat 12.220.19-20: वे काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और मिथ्या आत्मप्रशंसा जैसे दुर्गुणों से युक्त हैं। अतः कठोर एवं उत्तम व्रत का पालन करने वाले ब्राह्मण को चाहिए कि वह अपनी इंद्रियों तथा काम-क्रोध को वश में करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उत्साहपूर्वक कठोर तप में लग जाए तथा निर्विघ्न होकर, मृत्यु के समय की प्रतीक्षा करते हुए, धैर्यपूर्वक संसार में विचरण करे।   |   mahabharat अध्याय 12.220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 220: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  12.220.19-20 
कामक्रोधौ च लोभश्च परस्येर्ष्याविकत्थना।
कामक्रोधौ वशे कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:॥ १९॥
विक्रम्य घोरे तपसि ब्राह्मण: संशितव्रत:।
कालाकाङ्क्षी चरेल्लोकान् निरपाय इवात्मवान्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
वे काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और मिथ्या आत्मप्रशंसा जैसे दुर्गुणों से युक्त हैं। अतः कठोर एवं उत्तम व्रत का पालन करने वाले ब्राह्मण को चाहिए कि वह अपनी इंद्रियों तथा काम-क्रोध को वश में करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए उत्साहपूर्वक कठोर तप में लग जाए तथा निर्विघ्न होकर, मृत्यु के समय की प्रतीक्षा करते हुए, धैर्यपूर्वक संसार में विचरण करे।
 
They are full of vices like lust, anger, greed, envy towards others and false self-praise. Therefore, a Brahmin who observes a strict and excellent vow should control his senses and lust and anger and should engage in severe austerities with enthusiasm while observing celibacy and should wander around the world patiently, free from obstacles and awaiting the time of death.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दमप्रशंसायां विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २२०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दमकी प्रशंसाविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२०॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १०८ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १२८ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)