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mahabharat 12.22.6: हे राजन! यदि ब्राह्मण भी क्षत्रिय धर्म के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करे, तो उसका जीवन संसार में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है; क्योंकि क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्राह्मण से ही होती है।   |   mahabharat अध्याय 12.22: क्षत्रियधर्मकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनका पुन: राजा युधिष्ठिरको समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 22: क्षत्रियधर्मकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनका पुन: राजा युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.22.6 
ब्राह्मणस्यापि चेद् राजन् क्षत्रधर्मेण वर्तत:।
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्रं हि ब्रह्मसम्भवम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे राजन! यदि ब्राह्मण भी क्षत्रिय धर्म के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करे, तो उसका जीवन संसार में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है; क्योंकि क्षत्रिय की उत्पत्ति ब्राह्मण से ही होती है।
 
'O King! If a Brahmin also lives his life according to the dharma of a Kshatriya, then his life is considered to be the best in the world; because the Kshatriya is born from a Brahmin only.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)