श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 22: क्षत्रियधर्मकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनका पुन: राजा युधिष्ठिरको समझाना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.22.15 
भवितव्यं तथा तच्च यद् वृत्तं भरतर्षभ।
दिष्टं हि राजशार्दूल न शक्यमतिवर्तितुम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे भरतश्रेष्ठ! जो कुछ हुआ है, वह तो इसी प्रकार होना ही था। हे राजन! ईश्वर का विधान कभी भंग नहीं हो सकता॥15॥
 
'Bharat's best! Whatever has happened was bound to happen in that way. O King! The law of God cannot be violated.॥ 15॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये द्वाविंशोऽध्याय:॥ २२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २२॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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