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श्लोक 12.22.10  |
जित्वारीन् क्षत्रधर्मेण प्राप्य राज्यमकण्टकम्।
विजितात्मा मनुष्येन्द्र यज्ञदानपरो भव॥ १०॥ |
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| अनुवाद |
| नरेन्द्र! क्षत्रिय धर्म के अनुसार तुमने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके राज्य प्राप्त कर लिया है। अब अपने मन को वश में करो और यज्ञ तथा दान में लगो। 10॥ |
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| 'Narendra! According to Kshatriya Dharma, you have won the kingdom by conquering your enemies. Now control your mind and engage in yagya and charity. 10॥ |
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