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mahabharat 12.219.d7: जनक बोले, "ब्राह्मण! मैं तुम्हें किसी भी प्रकार का दंड नहीं दूँगा। तुम्हें मेरे राज्य से चले जाना चाहिए, जहाँ तक मेरे राज्य की सीमा है।"   |   mahabharat अध्याय 12.219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक d7
 
 
श्लोक  12.219.d7 
जनक उवाच
न त्वां ब्राह्मण दण्डेन नियोक्ष्यामि कथंचन।
मम राज्याद् विनिर्गच्छ यावत् सीमा भुवो मम॥
 
 
अनुवाद
जनक बोले, "ब्राह्मण! मैं तुम्हें किसी भी प्रकार का दंड नहीं दूँगा। तुम्हें मेरे राज्य से चले जाना चाहिए, जहाँ तक मेरे राज्य की सीमा है।"
 
Janaka said, "Brahmin! I will not punish you in any way. You should leave my kingdom as far as the boundary of my kingdom extends."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)