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mahabharat 12.219.d3: महाप्रज्ञ जनक आध्यात्मिक सिद्धांतों के विशेषज्ञ होने के कारण निःस्वार्थ भाव से यज्ञ, दान, दाह और पृथ्वी का निरीक्षण करते हुए भी उस आध्यात्मिक ज्ञान में लीन रहते थे।   |   mahabharat अध्याय 12.219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक d3
 
 
श्लोक  12.219.d3 
यजन् ददंस्तथा जुह्वन् पालयन् पृथिवीमिमाम्।
अध्यात्मविन्महाप्राज्ञस्तन्मयत्वेन निष्ठित:॥
 
 
अनुवाद
महाप्रज्ञ जनक आध्यात्मिक सिद्धांतों के विशेषज्ञ होने के कारण निःस्वार्थ भाव से यज्ञ, दान, दाह और पृथ्वी का निरीक्षण करते हुए भी उस आध्यात्मिक ज्ञान में लीन रहते थे।
 
Mahapragya Janak, being an expert in spiritual principles, remained engrossed in that spiritual knowledge even while selflessly performing yagya, charity, burning and observing the earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)