श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.219.6 
उच्छेदनिष्ठा नेहास्ति भावनिष्ठा न विद्यते।
अयं ह्यपि समाहार: शरीरेन्द्रियचेतसाम्।
वर्तते पृथगन्योन्यमप्यपाश्रित्य कर्मसु॥ ६॥
 
 
अनुवाद
राजन! मृत्यु के पश्चात् आत्मा न तो नष्ट होती है और न ही किसी विशेष रूप में परिवर्तित होती है। यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला प्रभाव भी शरीर, इन्द्रिय और मन का संयोग मात्र है। ये सभी पृथक्-पृथक् होते हुए भी एक-दूसरे की सहायता लेकर कर्म में प्रवृत्त होते हैं। 6॥
 
'King! After death, the soul neither gets destroyed nor does it transform into any particular shape. This directly visible impact is also just a combination of body, senses and mind. Even though all of them are separate, they take help of each other and engage in action. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)