Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.219.47: जैसे मकड़ी अपना जाला बुनती है और उस पर घूमती रहती है, किन्तु जब उसका जाला नष्ट हो जाता है, तो वह एक स्थान पर स्थिर हो जाती है, वैसे ही अज्ञानवश गिरा हुआ प्राणी भी कर्म के जाल में भटकता रहता है और उससे मुक्त होने पर दुःख से मुक्त हो जाता है। जैसे पर्वत पर फेंका गया मिट्टी का ढेला उससे टकराकर चूर-चूर हो जाता है, वैसे ही उसके सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं॥ 47॥ | mahabharat अध्याय 12.219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जैसे मकड़ी अपना जाला बुनती है और उस पर घूमती रहती है, किन्तु जब उसका जाला नष्ट हो जाता है, तो वह एक स्थान पर स्थिर हो जाती है, वैसे ही अज्ञानवश गिरा हुआ प्राणी भी कर्म के जाल में भटकता रहता है और उससे मुक्त होने पर दुःख से मुक्त हो जाता है। जैसे पर्वत पर फेंका गया मिट्टी का ढेला उससे टकराकर चूर-चूर हो जाता है, वैसे ही उसके सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं॥ 47॥
Just as a spider spins its web and keeps moving around on it, but when its web is destroyed it settles down at one place, similarly a creature falling down due to ignorance keeps wandering in the web of karma and on getting free from it becomes free from sorrow. Just as a lump of mud thrown on a mountain gets crushed on hitting it, similarly all his sorrows get destroyed.॥ 47॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥