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mahabharat 12.219.45: परंतु अज्ञानी मनुष्यों द्वारा संतान-मोह और विविध देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किए गए स्वार्थपूर्ण कर्म ही मनुष्य के लिए प्रबल बंधन हैं। जब मनुष्य इन बंधनों से मुक्त हो जाता है और सुख-दुःख की चिंता छोड़ देता है, तब वह सूक्ष्म शरीर का अभिमान त्यागकर उत्तम गति को प्राप्त होता है ॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 12.219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  12.219.45 
दृढैर्हि पाशैर्बहुभिर्विमुक्त:
प्रजानिमित्तैरपि दैवतैश्च।
यदा ह्यसौ सुखदु:खे जहाति
मुक्तस्तदाग्रॺां गतिमेत्यलिङ्ग:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
परंतु अज्ञानी मनुष्यों द्वारा संतान-मोह और विविध देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किए गए स्वार्थपूर्ण कर्म ही मनुष्य के लिए प्रबल बंधन हैं। जब मनुष्य इन बंधनों से मुक्त हो जाता है और सुख-दुःख की चिंता छोड़ देता है, तब वह सूक्ष्म शरीर का अभिमान त्यागकर उत्तम गति को प्राप्त होता है ॥ 45॥
 
But the selfish actions performed by ignorant people due to attachment to children and to please various gods are all strong bondages for man. When he is freed from these bondages and gives up the concern for pleasure and pain, then he gives up the pride of the subtle body and attains the best state. ॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)