श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.219.33 
एवं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चेति पञ्चमी।
स्पर्शे रूपे रसे गन्धे तानि चेतो मनश्च तत्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका क्रमशः स्पर्श, रूप, रस और गंध के निवासस्थान हैं और उनके मूल महाभूतों के रूप हैं। इन सबका कारण मन है, अतः ये सब मन के ही रूप हैं॥ 33॥
 
Similarly, the skin, eyes, tongue and nose are respectively the abodes of touch, form, taste and smell and are the forms of their basic Mahabhutas. The cause of all these is the mind, hence all of them are the form of the mind.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)