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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 219: पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  12.219.30 
यत् त्वसंतोषसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मन:।
प्रवृत्तं रज इत्येवं ततस्तदपि चिन्तयेत् ॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जो अपने लिए असंतोषजनक और अप्रिय है, उसे रजोगुण की प्रवृत्ति और वृद्धि समझना चाहिए।
 
That which is unsatisfactory and unpleasant to oneself should be understood as the tendency and increase of the Rajoguna. 30.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)