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mahabharat 12.218.8: वे ऋषियों में अद्वितीय कहे जाते हैं। वे पूर्णतः कामनाशून्य थे। वे अपने उपदेशों के माध्यम से मनुष्यों के हृदय में अत्यंत दुर्लभ शाश्वत सुख की स्थापना करना चाहते थे। 8॥   |   mahabharat अध्याय 12.218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.218.8 
ऋषीणामाहुरेकं तं यं कामानावृतं नृषु।
शाश्वतं सुखमत्यन्तमन्विच्छन्तं सुदुुर्लभम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वे ऋषियों में अद्वितीय कहे जाते हैं। वे पूर्णतः कामनाशून्य थे। वे अपने उपदेशों के माध्यम से मनुष्यों के हृदय में अत्यंत दुर्लभ शाश्वत सुख की स्थापना करना चाहते थे। 8॥
 
He is said to be unique among the sages. He was completely void of desires. He wanted to establish the very rare eternal happiness in the hearts of humans through his teachings. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)