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mahabharat 12.218.48: पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु- ये सदैव शरीर की रक्षा करते हैं। जब मनुष्य यह भली-भाँति समझ लेता है, तो फिर इनमें आसक्ति कैसे हो सकती है? जो शरीर एक दिन मरने वाला है, उसमें सुख कहाँ? ॥48॥   |   mahabharat अध्याय 12.218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.218.48 
भूव्योमतोयानलवायवोऽपि
सदा शरीरं प्रतिपालयन्ति।
इतीदमालक्ष्य रति: कुतो भवेद्
विनाशिनोऽप्यस्य न शर्म विद्यते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु- ये सदैव शरीर की रक्षा करते हैं। जब मनुष्य यह भली-भाँति समझ लेता है, तो फिर इनमें आसक्ति कैसे हो सकती है? जो शरीर एक दिन मरने वाला है, उसमें सुख कहाँ? ॥48॥
 
Earth, sky, water, fire and air-these always protect the body. When one understands this well, how can one have attachment towards them? Where is happiness in a body which is going to die one day? ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)