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mahabharat 12.218.39: ऋतुएँ, संवत्सर, युग, शीत, ग्रीष्म, सुखद और अप्रिय वस्तुएँ - ये सब वस्तुएँ आती-जाती रहती हैं और पुनः लौटकर आती हैं, ये सब लोग प्रत्यक्ष देखते हैं। इसी प्रकार सत्त्व के क्षयरूप मोक्ष भी आ-जा सकता है (क्योंकि ज्ञान के प्रवाह का अन्त नहीं है)।॥39॥   |   mahabharat अध्याय 12.218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.218.39 
ऋतुसंवत्सरौ तिष्य: शीतोष्णेऽथ प्रियाप्रिये।
यथातीतानि पश्यन्ति तादृश: सत्त्वसंक्षय:॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
ऋतुएँ, संवत्सर, युग, शीत, ग्रीष्म, सुखद और अप्रिय वस्तुएँ - ये सब वस्तुएँ आती-जाती रहती हैं और पुनः लौटकर आती हैं, ये सब लोग प्रत्यक्ष देखते हैं। इसी प्रकार सत्त्व के क्षयरूप मोक्ष भी आ-जा सकता है (क्योंकि ज्ञान के प्रवाह का अन्त नहीं है)।॥39॥
 
Seasons, Samvatsaras, Yugas, winters, summers, pleasant and unpleasant things - all these things come and go and come back again, all these people see this directly. In the same way, salvation in the form of the decay of Sattva can also come and go again (because the flow of knowledge has no end).॥ 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)