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mahabharat 12.218.38: यदि ऐसा कहा जाए कि यज्ञदत्त का ज्ञान देवदत्त के ज्ञान से भिन्न एवं पृथक है, कर्म का भोग और उसका फल समरूप ज्ञान की धारा में ही प्राप्त होता है; अतः देवदत्त द्वारा किए गए कर्म का भोग यज्ञदत्त नहीं कर सकता, जिससे पूर्वोक्त दोष की आपत्ति संभव नहीं है, तो हम पूछते हैं कि आपके मत में इस उत्पन्न होने वाले समरूप या समरूप ज्ञान का उपादान क्या है? यदि पूर्व प्रतिबिम्ब के ज्ञान को उपादान कहा जाए, तो वह ठीक नहीं है; क्योंकि वह ज्ञान नष्ट हो चुका है और यदि पूर्व प्रतिबिम्ब के ज्ञान का नाश ही परवर्ती प्रतिबिम्ब के समरूप ज्ञान की उत्पत्ति का कारण है, तो यदि कुछ लोग किसी के शरीर को मूसलों से मार डालें, तो उस मृत शरीर से पुनः दूसरा शरीर उत्पन्न हो सकता है (अतः यह मत ठीक नहीं है)।॥38॥   |   mahabharat अध्याय 12.218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.218.38 
तथा हि मुसलैर्हन्यु: शरीरं तत् पुनर्भवेत्।
पृथग्ज्ञानं यदन्यच्च येनैतन्नोपपद्यते॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
यदि ऐसा कहा जाए कि यज्ञदत्त का ज्ञान देवदत्त के ज्ञान से भिन्न एवं पृथक है, कर्म का भोग और उसका फल समरूप ज्ञान की धारा में ही प्राप्त होता है; अतः देवदत्त द्वारा किए गए कर्म का भोग यज्ञदत्त नहीं कर सकता, जिससे पूर्वोक्त दोष की आपत्ति संभव नहीं है, तो हम पूछते हैं कि आपके मत में इस उत्पन्न होने वाले समरूप या समरूप ज्ञान का उपादान क्या है? यदि पूर्व प्रतिबिम्ब के ज्ञान को उपादान कहा जाए, तो वह ठीक नहीं है; क्योंकि वह ज्ञान नष्ट हो चुका है और यदि पूर्व प्रतिबिम्ब के ज्ञान का नाश ही परवर्ती प्रतिबिम्ब के समरूप ज्ञान की उत्पत्ति का कारण है, तो यदि कुछ लोग किसी के शरीर को मूसलों से मार डालें, तो उस मृत शरीर से पुनः दूसरा शरीर उत्पन्न हो सकता है (अतः यह मत ठीक नहीं है)।॥38॥
 
If it is said that the knowledge of Yagyadutt is different and distinct from the knowledge of Devadutt, the enjoyment of karma and its result is attained only in the stream of homogeneous knowledge; hence Yagyadutt cannot enjoy the karma done by Devadutt, due to which the objection of the aforesaid defect is not possible, then we ask that in your opinion what is the material of this similarity or homogeneous knowledge which is generated? If the knowledge of the previous reflection is said to be the material, then it is not correct; because that knowledge has been destroyed and if the destruction of the knowledge of the previous reflection is the reason for the creation of the homogeneous knowledge of the subsequent reflection, then if some people kill someone's body with pestles, then another body can be re-generated from that dead body (therefore this opinion is not correct).॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)