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mahabharat 12.218.27: अनुमान और आगम, दोनों प्रमाणों का मूल प्रत्यक्ष प्रमाण है। यदि आगम या अनुमान प्रत्यक्ष अनुभव के विरुद्ध है, तो वह कुछ भी नहीं है - उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती।॥27॥   |   mahabharat अध्याय 12.218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.218.27 
प्रत्यक्षं ह्येतयोर्मूलं कृतान्तैतिह्ययोरपि।
प्रत्यक्षेणागमो भिन्न: कृतान्तो वा न किञ्चन॥ २७॥
 
 
अनुवाद
अनुमान और आगम, दोनों प्रमाणों का मूल प्रत्यक्ष प्रमाण है। यदि आगम या अनुमान प्रत्यक्ष अनुभव के विरुद्ध है, तो वह कुछ भी नहीं है - उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती।॥27॥
 
The root of both evidences, inference and Agama, is direct evidence. If Agama or inference is against direct experience, then it is nothing – its authenticity cannot be accepted.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)