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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.218.21 
जातिनिर्वेदमुक्त्वा स कर्मनिर्वेदमब्रवीत्।
कर्मनिर्वेदमुक्त्वा च सर्वनिर्वेदमब्रवीत्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जटनिर्वेद' 1 का वर्णन करने के बाद उन्होंने 'कर्मनिर्वेद' 2 का उपदेश दिया। उसके बाद उन्होंने 'सर्वनिर्वेद' 3 के विषय में बताया। 21॥
 
After describing ‘Jatnirveda’ 1, he preached ‘Karmanirveda’ 2. After that he told about 'Sarvanirveda' 3. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)