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mahabharat 12.218.14: उस ऋषियों के समूह को आसुरी ने अनेक रूपों में प्रकट होने वाले एकमात्र सनातन ब्रह्म का ज्ञान प्रचारित किया ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 218: राजा जनकके दरबारमें पञ्चशिखका आगमन और उनके द्वारा नास्तिक मतोंके निराकरणपूर्वक शरीरसे भिन्न आत्माकी नित्य सत्ताका प्रतिपादन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.218.14 
यत् तदेकाक्षरं ब्रह्म नानारूपं प्रदृश्यते।
आसुरिर्मण्डले तस्मिन् प्रतिपेदे तदव्ययम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उस ऋषियों के समूह को आसुरी ने अनेक रूपों में प्रकट होने वाले एकमात्र सनातन ब्रह्म का ज्ञान प्रचारित किया ॥14॥
 
The knowledge of the one and only eternal Brahman which appears in various forms was propagated by Asuri to that group of sages. ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)