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mahabharat 12.217.21: योगनिष्ठ योगी की बुद्धि कर्मों से विचलित नहीं होती। वैराग्य के कारण वह अपने स्वरूप में स्थित रहता है, रजोगुण से रहित होता है और शरीर में रहते हुए भी ध्वनि आदि किसी भी बाधा के बिना सर्वत्र विचरण करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.217.21 
रजोवर्ज्योऽप्ययं देही देहवाञ्छब्दवच्चरेत्।
कार्यैरव्याहतमतिर्वैराग्यात् प्रकृतौ स्थित:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
योगनिष्ठ योगी की बुद्धि कर्मों से विचलित नहीं होती। वैराग्य के कारण वह अपने स्वरूप में स्थित रहता है, रजोगुण से रहित होता है और शरीर में रहते हुए भी ध्वनि आदि किसी भी बाधा के बिना सर्वत्र विचरण करता है।
 
The intellect of a Yogi devoted to Yoga is not distracted by activities. Due to detachment, he remains situated in his own nature, is devoid of the Rajoguna (motive force) and even though in a body, he moves everywhere without any obstruction like sound.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)