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mahabharat 12.217.19: इससे साधक की इन्द्रियाँ भी सांसारिक सुखों से विरक्त हो जाती हैं। अतः उतना ही भोजन करना चाहिए जितना जीवित रहने के लिए वांछनीय हो।॥19॥   |   mahabharat अध्याय 12.217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.217.19 
वैमनस्यं च विषये यान्त्यस्य करणानि च।
तस्मात् तन्मात्रमादद्याद् यावदत्र प्रयोजनम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इससे साधक की इन्द्रियाँ भी सांसारिक सुखों से विरक्त हो जाती हैं। अतः उतना ही भोजन करना चाहिए जितना जीवित रहने के लिए वांछनीय हो।॥19॥
 
Due to this, the senses of the seeker also become detached from worldly pleasures. Therefore, one should eat only that much food which is desirable for survival.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)