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mahabharat 12.217.14: जो दैवी सम्पदा अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उस देहधारी पुरुष को चाहिए कि वह अपने मन को शुद्ध रखे और शरीर से कठोर नियमों का पालन करते हुए निर्दोष तप का अनुष्ठान करे ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 12.217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 217: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.217.14 
श्रियं दिव्यामभिप्रेप्सुर्वर्ष्मवान् मनसा शुचि:।
शारीरैर्नियमैरुग्रैश्चरेन्निष्कल्मषं तप:॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जो दैवी सम्पदा अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना चाहता है, उस देहधारी पुरुष को चाहिए कि वह अपने मन को शुद्ध रखे और शरीर से कठोर नियमों का पालन करते हुए निर्दोष तप का अनुष्ठान करे ॥14॥
 
One who wishes to attain the divine wealth i.e. knowledge of Brahman, that embodied man should keep his mind pure and perform the ritual of innocent penance by following strict rules with his body. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)