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mahabharat 12.216.6: विद्वान महर्षि कहते हैं कि जाग्रत अवस्था में जब श्रवण आदि इन्द्रियाँ निरन्तर शब्द आदि का सेवन करते-करते थक जाती हैं, तब सभी जीवों के अनुभव में आने वाला स्वप्न दिखाई देने लगता है। उस समय इन्द्रियों की लय होते हुए भी मन की लय नहीं होती; इसलिए वह मन के द्वारा जो कुछ अनुभव करता है, उसे स्वप्न कहते हैं। इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध दृष्टान्त कहा जाता है। 6॥   |   mahabharat अध्याय 12.216: स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें मनकी स्थिति तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 216: स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें मनकी स्थिति तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.216.6 
इन्द्रियाणां श्रमात् स्वप्नमाहु: सर्वगतं बुधा:।
मनसस्त्वप्रलीनत्वात् तत् तदाहुर्निदर्शनम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
विद्वान महर्षि कहते हैं कि जाग्रत अवस्था में जब श्रवण आदि इन्द्रियाँ निरन्तर शब्द आदि का सेवन करते-करते थक जाती हैं, तब सभी जीवों के अनुभव में आने वाला स्वप्न दिखाई देने लगता है। उस समय इन्द्रियों की लय होते हुए भी मन की लय नहीं होती; इसलिए वह मन के द्वारा जो कुछ अनुभव करता है, उसे स्वप्न कहते हैं। इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध दृष्टान्त कहा जाता है। 6॥
 
Learned Maharishis say that in the waking state, when the senses like hearing, hearing etc. get tired by continuously absorbing words etc., then the dream that comes in the experience of all living beings starts appearing. At that time, despite the rhythm of the senses, there is no rhythm of the mind; Therefore whatever he experiences through his mind is called a dream. A famous parable is told in this regard. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)