श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 216: स्वप्न और सुषुप्ति-अवस्थामें मनकी स्थिति तथा गुणातीत ब्रह्मकी प्राप्तिका उपाय  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.216.5 
अत्रोच्यते यथा ह्येतद् वेद योगेश्वरो हरि:।
तथैतदुपपन्नार्थं वर्णयन्ति महर्षय:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
अब यहाँ एक सिद्धांत प्रतिपादित किया जा रहा है। इस स्वप्नलोक का यथार्थ स्वरूप तो योगेश्वर श्रीहरि ही जानते हैं; किन्तु महर्षि भी इसका वर्णन उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार श्रीहरि जानते हैं। उनका वर्णन भी तर्कपूर्ण है। ॥5॥
 
Now a theory is being propounded here. Only Yogeshwar Shri Hari knows the exact nature of this dream world; but the Maharishi also describes it in the same way as Shri Hari knows it. His description is also logical. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)