श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.215.5 
यत् कृतं स्याच्छुभं कर्म पापं वा यदि वाश्नुते।
तस्माच्छुभानि कर्माणि कुर्याद् वा बुद्धिकर्मभि:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जो भी अच्छे या बुरे कर्म करता है, उसका फल उसे स्वयं ही भोगना पड़ता है; इसलिए उसे मन, बुद्धि और कर्मों से सदैव शुभ कर्म ही करने चाहिए ॥5॥
 
Whatever good or bad deeds a man does, he has to suffer their consequences himself; therefore he should always perform auspicious deeds through his mind, intellect and actions. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)