श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 215: आसक्ति छोड़कर सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.215.4 
अथवा मनस: सङ्गं पश्येद् भूतानुकम्पया।
तत्राप्युपेक्षां कुर्वीत ज्ञात्वा कर्मफलं जगत‍्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
अथवा प्राणियों पर दया करने से भी मोहवश मन उनमें आसक्त हो जाता है। इस बात का ध्यान करो और यह ध्यान रखते हुए कि सारा जगत अपने-अपने कर्मों का फल भोग रहा है, सबके प्रति उदासीन रहो। ॥4॥
 
Or even by being kind to creatures, the mind gets attached to them due to infatuation. Pay attention to this and keeping in mind that the whole world is reaping the fruits of its own actions, be indifferent towards everyone. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)