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mahabharat 12.214.4: जैसे अंधा मनुष्य मार्ग पर अकेला होने पर अनेक प्रकार के दुःख भोगता है, वैसे ही ज्ञानहीन मनुष्य को इस संसार में अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं; इसलिए ज्ञानी पुरुष सबसे श्रेष्ठ है ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.214.4 
नेत्रहीनो यथा ह्येक: कृच्छ्राणि लभतेऽध्वनि।
ज्ञानहीनस्तथा लोके तस्माज्ज्ञानविदोऽधिका:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जैसे अंधा मनुष्य मार्ग पर अकेला होने पर अनेक प्रकार के दुःख भोगता है, वैसे ही ज्ञानहीन मनुष्य को इस संसार में अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं; इसलिए ज्ञानी पुरुष सबसे श्रेष्ठ है ॥4॥
 
Just as a blind man suffers many kinds of pain when he is alone on the road, similarly a man without knowledge has to suffer many kinds of troubles in this world; hence a wise man is the best of all. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)