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श्लोक 12.214.4  |
नेत्रहीनो यथा ह्येक: कृच्छ्राणि लभतेऽध्वनि।
ज्ञानहीनस्तथा लोके तस्माज्ज्ञानविदोऽधिका:॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे अंधा मनुष्य मार्ग पर अकेला होने पर अनेक प्रकार के दुःख भोगता है, वैसे ही ज्ञानहीन मनुष्य को इस संसार में अनेक प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं; इसलिए ज्ञानी पुरुष सबसे श्रेष्ठ है ॥4॥ |
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| Just as a blind man suffers many kinds of pain when he is alone on the road, similarly a man without knowledge has to suffer many kinds of troubles in this world; hence a wise man is the best of all. ॥ 4॥ |
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