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mahabharat 12.214.28: युवावस्था में अर्जित ज्ञान प्रायः वृद्धावस्था में क्षीण हो जाता है, किन्तु परिपक्व व्यक्ति समय रहते ऐसी मानसिक शक्ति प्राप्त कर लेता है कि उसका ज्ञान कभी क्षीण नहीं होता ॥28॥   |   mahabharat अध्याय 12.214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.214.28 
तरुणाधिगतं ज्ञानं जरादुर्बलतां गतम्।
विपक्वबुद्धि: कालेन आदत्ते मानसं बलम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
युवावस्था में अर्जित ज्ञान प्रायः वृद्धावस्था में क्षीण हो जाता है, किन्तु परिपक्व व्यक्ति समय रहते ऐसी मानसिक शक्ति प्राप्त कर लेता है कि उसका ज्ञान कभी क्षीण नहीं होता ॥28॥
 
The knowledge acquired in youth often diminishes in old age, but a mature person acquires such mental strength in time that his knowledge never diminishes. ॥28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)