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श्लोक 12.214.24  |
ये वै शुक्रगतिं विद्युर्भूतसंकरकारिकाम्।
विरागा दग्धदोषास्ते नाप्नुयुर्देहसम्भवम्॥ २४॥ |
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| अनुवाद |
| जो लोग जानते हैं कि वीर्य की गति ही समस्त प्राणियों में संकरण का कारण है, वे विरक्त हो जाते हैं और अपने समस्त दोषों को नष्ट कर देते हैं; इसलिए वे पुनः शरीर से नहीं बंधते ॥24॥ |
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| Those who know that the movement of semen is the cause of hybridisation in all beings, become detached and destroy all their defects; hence they do not get bound to the body again. ॥24॥ |
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