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mahabharat 12.214.21: जैसे दूध में छिपा हुआ घी मथनी से मथकर अलग किया जाता है, वैसे ही शरीर में विचार तथा इन्द्रियों के द्वारा आने वाले स्त्री-दर्शन और स्पर्श आदि से पुरुष का वीर्य मथकर अलग किया जाता है ॥21॥   |   mahabharat अध्याय 12.214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.214.21 
पयस्यन्तर्हितं सर्पिर्यद्वन्निर्मथ्यते खजै:।
शुक्रं निर्मथ्यते तद्वत् देहसंकल्पजै: खजै:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
जैसे दूध में छिपा हुआ घी मथनी से मथकर अलग किया जाता है, वैसे ही शरीर में विचार तथा इन्द्रियों के द्वारा आने वाले स्त्री-दर्शन और स्पर्श आदि से पुरुष का वीर्य मथकर अलग किया जाता है ॥21॥
 
Just as the ghee hidden in milk is separated by churning it using a churner, similarly the semen of a man is churned out by the thoughts in the body and the sight and touch of women etc. which come through the senses. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)