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mahabharat 12.214.20: उस नाड़ी के पीछे चलने वाली तथा पूरे शरीर में फैली हुई अन्य नाड़ियाँ तेजस गुण के रूप को ग्रहण करने की शक्ति लेकर आँखों तक पहुँचती हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.214.20 
सर्वगात्रप्रतायिन्यस्तस्या ह्यनुगता: शिरा:।
नेत्रयो: प्रतिपद्यन्ते वहन्त्यस्तैजसं गुणम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
उस नाड़ी के पीछे चलने वाली तथा पूरे शरीर में फैली हुई अन्य नाड़ियाँ तेजस गुण के रूप को ग्रहण करने की शक्ति लेकर आँखों तक पहुँचती हैं।
 
The other nerves running behind that nadi and spread throughout the body reach the eyes carrying the power of receiving the form of Tejas Guna.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)