| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति » श्लोक 18 |
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| | | | श्लोक 12.214.18  | एवमेता: शिरा नद्यो रसोदा देहसागरम्।
तर्पयन्ति यथाकालमापगा इव सागरम्॥ १८॥ | | | | | | अनुवाद | | जैसे नदियाँ समयानुसार अपने जल से समुद्र को तृप्त करती रहती हैं, वैसे ही ये शिरारूपी नदियाँ रस धारण करती हुई इस देहरूपी समुद्र को तृप्त करती रहती हैं॥18॥ | | | | Just as rivers keep saturating the ocean with their water in due course, so too these rivers in the form of veins, carrying the juices, keep saturating this body-ocean.॥ 18॥ | | ✨ ai-generated | | |
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