श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.214.17 
दश विद्याद् धमन्योऽत्र पञ्चेन्द्रियगुणावहा:।
याभि: सूक्ष्मा: प्रतायन्ते धमन्योऽन्या: सहस्रश:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
इस शरीर में ऐसी दस नाड़ियाँ हैं जो वात, पित्त आदि उपर्युक्त दस पदार्थों का वहन करती हैं और जो पाँचों इन्द्रियों के शब्द आदि गुणों को ग्रहण करने की शक्ति प्रदान करती हैं। इनके साथ ही अन्य हजारों सूक्ष्म नाड़ियाँ भी सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई हैं॥17॥
 
There are ten such nerves in this body which carry the above mentioned ten things like Vata, Pitta etc. and which provide the power to perceive the qualities of sound etc. of the five senses. Along with them, thousands of other subtle nerves are spread throughout the body.॥ 17॥
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