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mahabharat 12.214.16: अन्न से प्राप्त रस नाड़ी समूहों द्वारा संचारित होकर मनुष्य के वात, पित्त, कफ, रक्त, त्वचा, मांस, नाड़ियाँ, अस्थियाँ, मेद तथा सम्पूर्ण शरीर को तृप्त और पुष्ट करते हैं ॥16॥   |   mahabharat अध्याय 12.214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 214: ब्रह्मचर्य तथा वैराग्यसे मुक्ति  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.214.16 
वातपित्तकफाद् रक्तं त्वङ्मांसं स्नायुमस्थि च।
मज्जां देहं शिराजालैस्तर्पयन्ति रसा नृणाम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
अन्न से प्राप्त रस नाड़ी समूहों द्वारा संचारित होकर मनुष्य के वात, पित्त, कफ, रक्त, त्वचा, मांस, नाड़ियाँ, अस्थियाँ, मेद तथा सम्पूर्ण शरीर को तृप्त और पुष्ट करते हैं ॥16॥
 
The juices obtained from food, transmitted through the nerve groups, satisfy and nourish the vata, bile, phlegm, blood, skin, flesh, nerves, bones, fat and entire body of humans. 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)