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mahabharat 12.211.8: यह जन्म-मरणमय संसार चक्र के समान घूम रहा है। अव्यक्त इसकी नाभि है। व्यक्त (शरीर और इन्द्रियाँ आदि) इसके आरे हैं। सुख-दुःख, कामनाएँ आदि इसके घेरे हैं। आसक्ति इसकी धुरी है। यह चक्र निरन्तर घूमता रहता है। क्षेत्रज्ञ (आत्मा) इस चक्र पर इसका चालक बनकर विराजमान है॥ 8॥   |   mahabharat अध्याय 12.211: संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 211: संसारचक्र और जीवात्माकी स्थितिका वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.211.8 
अव्यक्तनाभं व्यक्तारं विकारपरिमण्डलम्।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं चक्रं स्निग्धाक्षं वर्तते ध्रुवम्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
यह जन्म-मरणमय संसार चक्र के समान घूम रहा है। अव्यक्त इसकी नाभि है। व्यक्त (शरीर और इन्द्रियाँ आदि) इसके आरे हैं। सुख-दुःख, कामनाएँ आदि इसके घेरे हैं। आसक्ति इसकी धुरी है। यह चक्र निरन्तर घूमता रहता है। क्षेत्रज्ञ (आत्मा) इस चक्र पर इसका चालक बनकर विराजमान है॥ 8॥
 
This world of birth and death is moving like a wheel. The unmanifested is its navel. The manifested (body and senses etc.) are its spokes. Happiness and sorrow, desires etc. are its rims. Attachment is its axle. This wheel keeps moving for sure. The knower of the field (soul) is seated on this wheel as its driver.॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)