श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 210: गुरु-शिष्यके संवादका उल्लेख करते हुए श्रीकृष्ण-सम्बन्धी अध्यात्मतत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  12.210.32 
रसज्ञाने तु जिह्वेयं व्याहृते वाक् तथोच्यते।
इन्द्रियैर्विविधैर्युक्तं सर्वं व्यक्तं मनस्तथा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
रस-ज्ञान के समय मन ही जिह्वा बन जाता है और बोलते समय मन ही वाक् इन्द्रिय कहलाता है। इस प्रकार विभिन्न इन्द्रियों के साथ जुड़कर मन ही उन सबके रूप में प्रकट होता है।
 
At the time of rasa-jnana (knowledge of rasa), the mind itself becomes the tongue and at the time of speaking, the mind itself is called the speech organ. In this way, by associating with the different senses, the mind itself appears in the form of all of them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)