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mahabharat 12.21.5: जब वह मन, वाणी और कर्म से किसी भी प्राणी से न तो द्रोह करता है और न ही किसी वस्तु की इच्छा करता है, तब वह परम ब्रह्म को प्राप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 12.21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.21.5 
यदासौ सर्वभूतानां न द्रुह्यति न काङ्क्षति।
कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जब वह मन, वाणी और कर्म से किसी भी प्राणी से न तो द्रोह करता है और न ही किसी वस्तु की इच्छा करता है, तब वह परम ब्रह्म को प्राप्त होता है।
 
When he neither betrays nor desires anything from any of the living beings by his mind, speech and action, then he attains the Supreme Brahma, the Supreme Being.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)