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mahabharat 12.21.4: जब मनुष्य किसी से नहीं डरता और जब अन्य प्राणी उससे नहीं डरते, तथा जब वह काम (मोह) और द्वेष को जीत लेता है, तब उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 12.21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.21.4 
न बिभेति यदा चायं यदा चास्मान्न बिभ्यति।
कामद्वेषौ च जयति तदाऽऽत्मानं च पश्यति॥ ४॥
 
 
अनुवाद
जब मनुष्य किसी से नहीं डरता और जब अन्य प्राणी उससे नहीं डरते, तथा जब वह काम (मोह) और द्वेष को जीत लेता है, तब उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है ॥4॥
 
When a man does not fear anyone and when other creatures do not fear him, and when he conquers lust (attachment) and hatred, then he realises his true nature. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)