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mahabharat 12.21.20: हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले युधिष्ठिर! इसी प्रकार रुद्र, वसु, आदित्य, साध्यगण तथा राजर्षियों के समूह ने सावधान होकर इस धर्म का आश्रय लिया है। फिर उन्होंने अपने पुण्य कर्मों से स्वर्ग प्राप्त किया है।   |   mahabharat अध्याय 12.21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.21.20 
एवं रुद्रा: सवसवस्तथाऽऽदित्या: परंतप।
साध्या राजर्षिसंघाश्च धर्ममेतं समाश्रिता:।
अप्रमत्तास्तत: स्वर्गं प्राप्ता: पुण्यै: स्वकर्मभि:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं को पीड़ा देने वाले युधिष्ठिर! इसी प्रकार रुद्र, वसु, आदित्य, साध्यगण तथा राजर्षियों के समूह ने सावधान होकर इस धर्म का आश्रय लिया है। फिर उन्होंने अपने पुण्य कर्मों से स्वर्ग प्राप्त किया है।
 
O Yudhishthira, who torments his enemies! Similarly, Rudra, Vasu, Aditya, Sadhyagana and the group of Rajarshis have taken shelter of this Dharma after being cautious. Then they have attained heaven by their pious deeds.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि देवस्थानवाक्ये एकविंशोऽध्याय:॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें देवस्थानवाक्यविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)