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mahabharat 12.21.18-19: इस प्रकार जो राजा धर्म का पालन करते हैं, सत्य, दान और तप में तत्पर रहते हैं, दया आदि गुणों से युक्त हैं, काम और क्रोध आदि दोषों से रहित हैं, प्रजा के हित में तत्पर हैं, धर्म के महान अनुयायी हैं तथा गौओं और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए युद्ध करते हैं, वे परम गति को प्राप्त हुए हैं ॥18-19॥   |   mahabharat अध्याय 12.21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 21: देवस्थान मुनिके द्वारा युधिष्ठिरके प्रति उत्तम धर्मका और यज्ञादि करनेका उपदेश  »  श्लोक 18-19
 
 
श्लोक  12.21.18-19 
एवं धर्ममनुक्रान्ता: सत्यदानतप:परा:।
आनृशंस्यगुणैर्युक्ता: कामक्रोधविवर्जिता:॥ १८॥
प्रजानां पालने युक्ता धर्ममुत्तममास्थिता:।
गोब्राह्मणार्थे युध्यन्त: प्राप्ता गतिमनुत्तमाम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जो राजा धर्म का पालन करते हैं, सत्य, दान और तप में तत्पर रहते हैं, दया आदि गुणों से युक्त हैं, काम और क्रोध आदि दोषों से रहित हैं, प्रजा के हित में तत्पर हैं, धर्म के महान अनुयायी हैं तथा गौओं और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए युद्ध करते हैं, वे परम गति को प्राप्त हुए हैं ॥18-19॥
 
Thus, those kings who follow Dharma, who are devoted to truth, charity and austerity, who are endowed with qualities like compassion, who are free from vices like lust and anger, who are devoted to the welfare of their subjects, who are great followers of Dharma and who fight to protect cows and Brahmins, have attained the highest state. ॥18-19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)